- विधानसभा परिसर में नामांकन के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी
- भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट समेत विधायक और पार्टी नेता रहे मौजूद
देहरादून: उत्तराखंड से राज्यसभा सीट के लिए भारतीय जनता पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी दिनेश आर्य ने मंगलवार को देहरादून स्थित विधानसभा परिसर में अपना नामांकन पत्र दाखिल किया। नामांकन के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित भाजपा के वरिष्ठ नेता, मंत्री, सांसद और विधायक मौजूद रहे।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दिनेश आर्य के नामांकन के अवसर पर उन्हें शुभकामनाएं दीं। मुख्यमंत्री ने कहा कि दिनेश आर्य सामान्य पृष्ठभूमि से आए हैं और उन्होंने पार्टी में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए हमेशा संगठन के दिशा-निर्देशों का पालन किया है। उन्होंने कहा कि दिनेश आर्य के राज्यसभा सांसद बनने से यह संदेश जाएगा कि भाजपा में एक सामान्य कार्यकर्ता भी बड़े दायित्व तक पहुंच सकता है।
मुख्यमंत्री धामी ने इस अवसर पर प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पार्टी नेतृत्व का आभार भी व्यक्त किया।
नामांकन से पहले मंगलवार सुबह भाजपा विधायक दल की बैठक भी आयोजित की गई। नामांकन दाखिल करने के बाद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने दिनेश आर्य के निर्विरोध निर्वाचित होने की उम्मीद जताई। उन्होंने कहा कि पार्टी के इस निर्णय से राज्य के सभी वर्गों और भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह का माहौल है।
नामांकन के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट, मंत्रीगण, सांसद और विधायकगण सहित पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता मौजूद रहे।
16 अक्टूबर को मतदान और मतगणना
भारत निर्वाचन आयोग के निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 6 अक्टूबर नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि है। नामांकन पत्रों की जांच 7 अक्टूबर को होगी, जबकि नाम वापसी की अंतिम तिथि 9 अक्टूबर 2026 निर्धारित है। आवश्यकता पड़ने पर 16 अक्टूबर 2026 को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक मतदान होगा और उसी दिन शाम 5 बजे से मतगणना की जाएगी।
नरेश बंसल का कार्यकाल 25 नवंबर को होगा पूरा
उत्तराखंड से राज्यसभा सांसद नरेश बंसल का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को पूरा हो रहा है। उनके स्थान पर भाजपा ने दिनेश आर्य को राज्यसभा चुनाव के लिए अपना अधिकृत प्रत्याशी बनाया है। राज्यसभा सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष का होता है और सदन स्थायी होने के कारण इसके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं।