लोगों की जान बचाने चमोली पहुंचे इंडियन नेवी के जाबांज, मार्कोस

उत्‍तराखंड एक बार फिर मुश्किलों में हैं. रविवार को चमोली जिले में ग्‍लेशियर फटने के बाद तबाही का मंजर है. अब तक 14 लोगों की मौत हो गई है और करीब 200 लोग लापता है. वैज्ञानिकों ने इस घटना की जांच तेज कर दी है. उधर सेना की तरफ से छह कॉलम और इंडियन नेवी की तरफ से गोताखोरों की सात टीमों को रवाना किया गया है. ये गोताखोर कोई और नहीं बल्कि नेवी के जाबांज मार्कोस कमांडो की टीम है.

साल 2013 में जब उत्‍तराखंड में केदारनाथ हादसा हुआ तो उस समय भी इंडियन नेवी के मार्कोस ने दुनिया को अपनी ताकत से रूबरू करवाया. इसके बाद साल 2014 में जम्‍मू कश्‍मीर में आई बाढ़ में भी मार्कोस ही थे जिन्‍होंने कई लोगों को जिदंगी दी.

मार्कोस को मगरमच्‍छ के नाम से भी जानते हैं. ये नेवी के स्पेशलाइज्ड मरीन कमांडोज़ हैं. मार्कोस उत्‍तराखंड की पहाड़‍ियां हो या जम्‍मू कश्‍मीर की झेलम और चेनाब जैसी गहरी नदियां या फिर मुंबई का गहरा समुद्र, हर जगह गोते लगाकर लोगों की जान बचाने का माद्दा रखते हैं. मार्कोस कमांडोज को पहले मरीन कमांडो फोर्स यानी एमसीएफ के नाम से भी जाना जाता था.

मार्कोस, इंडियन नेवी की एक स्‍पेशल ऑपरेशन यूनिट है. इसका मकसद कांउटर टेररिज्‍म, डायरेक्‍टर एक्‍शन, किसी जगह का खास निरीक्षण, अनकंवेंशनल वॉरफेयर, होस्‍टेज रेस्‍क्‍यू, पर्सनल रिकवरी और इस तरह के खास ऑपरेशनों को पूरा करना है.

वर्ष 1971 में भारत और पाकिस्‍तान के युद्ध के बाद इस बात पर जोर दिया गया कि इंडियन नेवी के पास स्‍पेशल कमांडो से लैस एक टीम होनी चाहिए. 14 फरवरी 1987 को मार्कोस का गठन किया गया था. मार्कोस का मोटो है, ‘द फ्यू द फियरलेस.’ अप्रैल 1986 में नेवी ने एक मैरीटाइम स्‍पेशल फोर्स की योजना शुरू की जिसका मकसद एक ऐसी फोर्स को तैयार करना था जो मुश्किल ऑपरेशनों और काउंटर टेररिस्‍ट ऑपरेशनों को अंजाम दे सकें.

उस समय नेवी ने कुछ खास ऑफिसर्स को इंडियन आर्मी और सिक्‍योरिटी फोर्सेज की ओर से शुरुआती ट्रेनिंग दिलवाई. इसके बाद तीन ऑफिसर्स को पहले यूएस नेवी सील्‍स कमांडो और फिर ब्रिटिश स्‍पेशल एयर सर्विस के पास एक विशेष कार्यक्रम के तहत ट्रेनिंग के लिए भेजा गया.

1991 में बदला गया नाम

साल 1991 में मार्कोस का नाम बदलकर आईएमएसएफ से बदलकर एमसीएफ कर दिया. मार्कोस ने साल 1990 में जम्‍मू कश्‍मीर की झेलम नदी और वूलर झील में ऑपरेशन रक्षक चलाया था. मार्कोस की टीम किसी भी हालत में कोई भी ऑपरेशन सफलतापूर्वक करने की क्षमता रखती है.

इसके कुछ कमांडो आज भी जम्‍मू-कश्‍मीर में आर्मी के साथ जुड़े हुए हैं. वे इलाके में काउंटर टेररिज्‍म में आर्मी का साथ देते हैं. 1999 में हुई कारगिल जंग में भी मार्कोस ने भारतीय सेना को काफी मदद की थी.

दुश्‍मन कहते हैं दाढ़ीवाला फौज

मार्कोस के लिए सेलेक्‍ट होने वाले कमांडो को कड़ी परीक्षा से गुजरना होता है. मार्कोस के लिए 20 वर्ष की आयु वाले युवकों का सेलेक्‍शन होता है. इन कमांडोज को अमेरिकी और ब्रिटिश फौजों के साथ ट्रेनिंग दी जाती है. दुश्‍मन के बीच मार्कोस का डर इस कदर है कि वह इस स्‍पेशल फोर्स को ‘ढाढ़ीवाला फौज’ कहकर बुलाते है क्‍योंकि अक्‍सर कमांडोज अपनी पहचान छिपाने के लिए ढाढ़ी रख लेते हैं.

मार्कोस के खास ऑपरेशन

2008 में जब मुंबई 26/11 को झेल रही थी उस समय मार्कोस ने ऑपरेशन ब्‍लैक टॉरनेडो लांच किया. ताज और ट्राइडेंट होटल में छिपे आतंकवादियों को मार कर मुंबई को आतंकियों से मुक्‍त कराया. इनकी ट्रेनिंग रेजीमेंट में एयरबॉर्न ऑपरेशन, कॉम्‍बेट डाइविंग कोर्सेज, काउंटर टेररिज्‍म, एंटी-हाइजैकिंग, एंटी-पाइरेसी ऑपरेशन, डायरेक्‍ट एक्‍शन, घुसपैठ और इस तरह की कड़ी ट्रेनिंग प्रक्रियायें शामिल होती हैं.

वर्ष 1987 में श्रीलंका में ‘ऑपरेशन पवन,’ वर्ष 1988 में मालद्वीप में ‘ऑपरेशन कैक्‍टस,’ वर्ष 1991 में ‘ऑपरेशन ताशा,’ जो कि ऑपरेशन पवन का ही दूसरा रूप था, वर्ष 1992 में लिट्टे के खिलाफ ‘ऑपरेशन जबर्दस्‍त’.