पौड़ी/कल्जीखाल: उत्तराखंड के पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन के बीच पौड़ी जनपद के कल्जीखाल स्थित मोती बाग गांव उम्मीद की एक नई अलख जगा रहा है। शहरों की भागदौड़, ट्रैफिक और प्रदूषण से दूर प्रकृति की गोद में बसा ‘रैबासा होम स्टे’ सिर्फ पर्यटकों के ठहरने का स्थान नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, आत्मनिर्भरता और ग्रामीण रोजगार का एक जीवंत मॉडल बन चुका है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रैबासा होम स्टे को उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ होम स्टे के सम्मान से नवाजा है, जिसके बाद यह देशभर के पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बन गया है। वरिष्ठ पत्रकार, रंगकर्मी और लेखक त्रिभुवन उनियाल द्वारा संचालित इस होम स्टे की सबसे बड़ी खासियत इसका पूरी तरह से पारंपरिक पहाड़ी स्वरूप है, जहां आने वाले मेहमानों का स्वागत आधुनिक चकाचौंध से नहीं बल्कि पहाड़ की सादगी, आत्मीयता और प्राकृतिक सौंदर्य से होता है।
इस होम स्टे में पर्यटकों को चौमीन, मोमो या फास्ट फूड की जगह उत्तराखंड की पारंपरिक रसोई का स्वाद परोसा जाता है। यहां आने वाले मेहमानों को गहत की दाल, झंगोरे की खीर, मंडुवे की रोटी, पहाड़ी स्वाद से भरपूर चौसू, धपड़ी, शुद्ध घर का दूध-दही-मक्खन और खेतों की ताजी जैविक सब्जियां दी जाती हैं। करीब 90 नाली भूमि पर जैविक खेती करने वाले त्रिभुवन उनियाल का मानना है कि यदि दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो गांवों में भी सम्मानजनक रोजगार पैदा किए जा सकते हैं। उनकी इस पहल से प्रेरित होकर आसपास के क्षेत्र में 5 से 6 अन्य युवाओं ने भी अपने होम स्टे शुरू किए हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और पर्यटन को नई दिशा मिली है। पर्यटकों का कहना है कि शहर के शोर-शराबे से दूर बांज, बुरांश और देवदार के जंगलों के बीच जो सुकून यहां मिलता है, उसके आगे सोशल मीडिया की दुनिया भी फीकी लगती है।
पारंपरिक पहाड़ी वास्तुकला शैली में बने इस भवन में आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ सांस्कृतिक पहचान को भी संजोया गया है, जिसके तहत इसके कमरों और हिस्सों के नाम ‘लक्ष्मी खोली’, ‘बदरी खोली’, ‘केदार खोली’ और ‘दीनानाथ रसोई’ रखे गए हैं। इस पूरे क्षेत्र और रैबासा होम स्टे की नींव प्रसिद्ध किसान व वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विद्यादत्त शर्मा ने रखी थी, जिनके संघर्षमयी जीवन और पर्यावरण प्रेम पर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘मोती बाग’ ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भी नामांकित हो चुकी है। डॉ. शर्मा ने वर्ष 1976 में ‘सुखदेई जलाशय’ का निर्माण कर जल संरक्षण की ऐतिहासिक मिसाल पेश की थी। आज उनके द्वारा विकसित यह क्षेत्र ‘मोती बाग’ के नाम से प्रसिद्ध है, जो यह साबित करता है कि यदि पहाड़ की संस्कृति, प्रकृति और स्थानीय संसाधनों को सही दिशा में रोजगार से जोड़ा जाए, तो पलायन के दर्द को आत्मनिर्भरता के बड़े अवसर में बदला जा सकता है।